देहरादून: प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से धामी सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए बोर्ड की मान्यता वाले 456 संस्थानों की ग्रांट रोकने का निर्णय लिया है।
उत्तराखंड सरकार ने राज्य की प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करने का मन बना लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य में संचालित हो रहे 456 विशेष धार्मिक शिक्षण संस्थानों (मदरसों) को मिलने वाली सरकारी वित्तीय सहायता (ग्रांट) को पूरी तरह से बंद करने का निर्णय लिया है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम राज्य के बजट को अधिक पारदर्शी बनाने और शिक्षा के लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाया गया है। इस फैसले के बाद से ही प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म हो गया है।
शासन स्तर से मिली जानकारी के मुताबिक, संबंधित बोर्ड की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने के बाद सरकार ने इसे मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली के साथ एकीकृत करने का विचार किया है। इसी सिलसिले में इन 456 संस्थानों को दी जाने वाली सालाना आर्थिक मदद पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब आगामी वित्तीय वर्ष से राज्य सरकार के बजट से इन विशिष्ट संस्थानों के संचालन, शिक्षकों के वेतन या रखरखाव के लिए अलग से कोई भी धनराशि आवंटित नहीं की जाएगी। सरकार अब इस बजट का उपयोग आधुनिक शिक्षा के विस्तार में करने की योजना बना रही है।
शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इस निर्णय से राज्य की समग्र शिक्षा नीति में एकरूपता आएगी। सरकार का मुख्य ध्यान अब सभी छात्रों को एक समान पाठ्यक्रम और आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराने पर है। इस नीतिगत बदलाव के तहत इन संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों को सामान्य सरकारी स्कूलों की मुख्यधारा से जोड़ने की रूपरेखा तैयार की जा रही है, ताकि उन्हें कंप्यूटर विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे आधुनिक विषयों की बेहतर शिक्षा मिल सके। हालांकि, ग्रांट रुकने से इन संस्थानों के प्रबंधन के सामने संचालन को लेकर नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
दूसरी तरफ, इस फैसले को लेकर जमीनी स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई सामाजिक विश्लेषकों और शिक्षाविदों ने सरकार के इस कदम को एक समान नागरिक और शैक्षणिक सुधार की दिशा में एक साहसिक प्रयास बताया है। उनका कहना है कि सरकारी धन का उपयोग किसी विशेष धार्मिक शिक्षा के बजाय आधुनिक और व्यावहारिक शिक्षा के लिए होना चाहिए। वहीं, कुछ संस्थान संचालकों और विपक्षी दलों ने इस पर चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि अचानक वित्तीय सहायता रोकने से इन संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों और पढ़ रहे विद्यार्थियों के भविष्य पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल, धामी सरकार अपने इस फैसले पर अडिग नजर आ रही है और इसे राज्य के व्यापक हित में लिया गया कदम बता रही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन संस्थानों के वैकल्पिक ढांचे और वहां पढ़ रहे छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या नए कदम उठाती है। प्रशासनिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि आने वाले समय में अन्य विभागों में भी इसी तरह के वित्तीय सुधार देखने को मिल सकते हैं, जिससे सरकारी खजाने के सदुपयोग को शत-प्रतिशत सुनिश्चित किया जा सके।
