ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में बोंडी बीच पर हुई फायरिंग की घटना के दौरान जहां लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, वहीं भारतीय मूल के एक युवक ने असाधारण साहस का परिचय देते हुए हमलावर का सामना किया। इस युवक का नाम अमनदीप सिंह बोला है, जिनकी सूझबूझ और हिम्मत की अब दुनियाभर में सराहना हो रही है।
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न्यूज़ीलैंड में जन्मे और फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में रह रहे 34 वर्षीय अमनदीप उस वक्त बोंडी बीच पर थे, जब अचानक गोलियों की आवाज गूंजने लगी। शुरुआती क्षणों में उन्हें लगा कि शायद पटाखे फूट रहे हों, लेकिन जैसे ही उन्होंने लोगों को डर के मारे भागते देखा, हालात की गंभीरता समझ आ गई।
अमनदीप ने बताया कि अधिकतर लोग सुरक्षित जगह की ओर दौड़ रहे थे, लेकिन उनका ध्यान इस बात पर गया कि गोली चलने की दिशा में क्या हो रहा है। बिना समय गंवाए वह उसी ओर दौड़ पड़े। जल्द ही उन्हें पता चला कि बीच पर दो बंदूकधारी लोगों को निशाना बना रहे हैं।
फुटब्रिज के पास उन्होंने देखा कि एक हमलावर पुलिस की गोली लगने से लड़खड़ा गया है। उसी क्षण अमनदीप ने जोखिम भरा फैसला लिया। उन्होंने दौड़कर हमलावर पर छलांग लगाई, उसकी बंदूक दूर फेंकी और उसे जमीन पर गिराकर कसकर दबोच लिया, ताकि वह दोबारा किसी को नुकसान न पहुंचा सके।
अमनदीप ने हमलावर को तब तक पकड़े रखा, जब तक पुलिस पूरी तरह मौके पर नहीं पहुंच गई। एक पुलिसकर्मी ने भी उनसे पकड़ बनाए रखने को कहा। कुछ ही देर में हालात काबू में आ गए और दूसरे शूटर को भी गिरफ्तार कर लिया गया। घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है, जिसमें अमनदीप सफेद टी-शर्ट और शॉर्ट्स में हमलावर की पीठ पर बैठे दिखाई देते हैं।
घटना के बाद अमनदीप को तेज घबराहट और एड्रेनालिन का असर महसूस हुआ। उन्होंने बताया कि आसपास मौजूद अलग-अलग देशों के लोग उनके साथ खड़े रहे। किसी ने उन्हें नारियल पानी दिया, तो कोई पास बैठकर ढांढस बंधाता रहा। अमनदीप के अनुसार, यही बोंडी बीच की असली बहुसांस्कृतिक पहचान है।
अमनदीप का कहना है कि उन्होंने कोई सोच-समझकर बहादुरी नहीं दिखाई, बल्कि हालात में जो सही लगा, वही किया। उनका मकसद सिर्फ इतना था कि किसी तरह लोगों की जान बचाई जा सके। हालांकि इस दर्दनाक अनुभव के बाद से उन्हें नींद आने में दिक्कत हो रही है।
अमनदीप सिंह बोला की जड़ें पंजाब के नवांशहर जिले के पास स्थित नौरां गांव से जुड़ी हैं। उनके परदादा 1916 में न्यूज़ीलैंड गए थे और वहीं बस गए। अमनदीप खुद करीब छह–सात साल पहले ऑस्ट्रेलिया आए थे और यहां पर्सनल ट्रेनर के रूप में काम करते हैं। वह कई बार भारत आ चुके हैं और 2019 में स्वर्ण मंदिर में माथा टेक चुके हैं।
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